वरिष्ठ तमिल सुपरस्टार M. K. Thyagaraja Bhagavathar के पोते ने Kaantha फिल्म पर मान-हानि का आरोप लगाते हुए किया मुकदमा
वरिष्ठ तमिल सुपरस्टार M. K. Thyagaraja Bhagavathar के पोते ने Kaantha फिल्म पर मान-हानि का आरोप लगाते हुए किया मुकदमा
तमिल सिनेमा के पहले सुपरस्टार माने जाने वाले M K Thyagaraja Bhagavathar को कथित रूप से अपमानजनक तरीके से प्रस्तुत करने को लेकर उनके पोते ने नई फिल्म Kaantha के खिलाफ चेंन्नई हाई-कोर्ट में मामला दर्ज कराया है। इस फिल्म में Dulquer Salmaan मुख्य भूमिका में हैं और फिल्म 14 नवंबर 2025 को रिलीज़ होने वाली थी।
पोर्टीशन में पोते B Thiagarajan का आरोप है कि फिल्म में उनके दादा को “ढीले नैतिक मूल्यों वाला व्यक्ति”, जीवन के अंत में गरीब, अंधा और भिक्षा मांगने वाला दिखाया गया है — जो उनकी ओर से कथित रूप से पूरी तरह गलत और अपमानजनक है। उनके मुताबिक, दादा एक सरल, शांत, धर्मपरायण एवं परोपकारी व्यक्ति थे, जिन्होंने कभी शराब नहीं पी और जीवन के आखिरी दिनों तक गरिमापूर्ण जीवन जिया।
मामला क्या है?
- B Thiagarajan का कहना है कि फिल्म निर्माता ने उनके दादा की जीवनी-आधारित कहानी बिना पारिवारिक अनुमति के तैयार की है। भले ही पात्रों के नाम बदले गए हों, फिल्म देखकर दर्शक सहज रूप से M K. T. का ही अनुमान लगा सकते हैं।
- उन्होंने अदालत से फिल्म की रिलीज़, प्रदर्शन, वितरण और स्ट्रीमिंग पर स्थायी रोक लगाने का अनुरोध किया है।
- फिल्म के पक्ष में निर्माताओं का कहना है कि Kaantha “पूरी तरह काल्पनिक कहानी” है और किसी वास्तविक व्यक्ति-जीवनी पर आधारित नहीं है।
M K. Thyagaraja Bhagavathar की विरासत
Thyagaraja Bhagavathar 1930-40 के दशक में तमिल सिनेमा के अग्रणी सितारों में थे — गायक तथा अभिनेता दोनों। उनकी फिल्म-हिट्स और गायकी ने उन्हें “तमिल सिनेमा का पहला सुपरस्टार” का दर्जा दिलाया। हालांकि, जीवन के आखिरी हिस्से में उन्होंने चुनौतियों का सामना किया, लेकिन उनका परिवार और कई ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि उन्होंने गरिमापूर्ण जीवन भराएको और परोपकार की दिशा में भी योगदान दिया।
फिल्म-मुकदमा के सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थ
यह विवाद सिर्फ एक फिल्म को लेकर नहीं है, बल्कि यह मल्टीमीडिया-आधारित जैव-चित्रों (biopics) और कल्पनात्मक कथाओं के बीच की सीमा, विरासत-मान्यता और कानूनी-नैतिक जिम्मेदारी को उजागर करता है।
- जब किसी सार्वजनिक व्यक्ति की जीवनी या उसके प्रभाव वाले पात्रों को पर्दे पर दिखाया जाता है, तो उनका परिवार, सामाजिक छवि और इतिहास को संभालना चुनौती बन जाता है।
- अधिकार-हवाले और उत्तराधिकारी यह तर्क देते हैं कि उनके पूर्वजों की छवि के साथ खेला जाना सिर्फ विवाद नहीं बल्कि विरासत-हानि हो सकती है।
- फिल्म-निर्माते अक्सर कहते हैं कि “भाषाई आज़ादी” है, लेकिन यह पूछे जाने का प्रश्न है कि वह आज़ादी कब-तक सामाजिक-मानवीय संवेदनाओं के दायरे में रहकर उपयोग होती है।
आगे क्या-क्या हो सकता है?
- अदालत अगली सुनवाई के लिए तारीख तय करेगी और निर्माता-प्रोडक्शन हाउस को जवाब देने का निर्देश दे सकती है।
- यदि अदालत ठोस रूप से मानहानि को स्थापित करती है, तो फिल्म की रिलीज़ पर रोक लग सकती है या मुआवज़ा-विवाद हो सकता है।
- दोनों पक्षों के बीच समझौता भी संभव है — जैसे शीर्षक-परिवर्तन, कथानक-संशोधन या परिवार-अपने हिस्से की अनुमति।
- इस मामले से फिल्म उद्योग में “अनुमति-प्रक्रिया”, “जीवनी-उत्पादन”, “परिवार-सहयोग” जैसे विषयों पर बहस तेज हो सकती है।